कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 14 मार्च 2019

चंदा मामा

चंदा  मामा आसमान  में  रोज़ चले  तुम आते हो
अपनी इन मुद्राओं से तुम मेरा  जी  ललचाते  हो।
कभी हो आधे, कभी हो पूरे ,कभी तीर बन जाते  हो
कैसे करते हो तुम ये करतब ,यूं आकार बदलने  का।
कहां  से सीखा है  ये जादू , तुमने करतब करने का
मै  तो वैसा ही  रहता हूं , दिन  रात और सांझ सवेरे।
मुझको भी वैसा बनना है , जैसे रूप है तुमने घेरे 
ये जादू आसमान में चलता, तो सूरज क्यूँ गोल ही रहता।
कया तुम सूरज से ज्ञानी हो , जो इतना सब कर लेते हो
वो देता दिन को उजियारा , तुम रैन उजेरी कर देते हो ।।

-जैतून ज़िया

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2015

"गुल्लू"- (बालगीत)

बच्चों, आज 'कलीम अव्वल' जी का लिखा बालगीत प्रस्तुत है. इस गीत से परिचय हमारे मित्र श्री प्रकाश गोविन्द जी ने कराया. आशा है कि आपको पसंद आएगा.

गुल्लू बाबू 'एयर गन' ले /करने चले शिकार
साथ गाँव भर के थे बच्चे /करते हाहाकार
***
गुल्लू बाबू लगे सुनाने /कैसे मारा शेर
कैसे मारा चीता हमने/हाथी से मुठभेड़
***
"इक दिन मिला भयंकर भालू /छेंक लिया पथ सारा
ऐसा मारा झापड़ उसको /उलट गया बेचारा
***
और बताएं गैंडा इक दिन /मेरे पीछे दौड़ा
एक उठाया ढेला हमने /माथा उसका फोड़ा
***
अरना भैंसा मिला एक दिन /लगा फुलाने नथुने
ऐसी डांट पिलाई उसको /थर-थर लगा कांपने
***
अजगर की फिर पूंछ पकड़ कर /घर तक उसे घसीटा
बाघों को तो बांध-बांध कर /जब जी चाहा पीटा "
***
तभी पांव पर इक चूहे ने /लम्बी कूद लगाई
तब से हैं बेहोश अभी तक/अपने गुल्लू भाई

गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

एगो रहलन राजा

बचपन के कई क़िस्से बड़े होने पर समझ में आते हैं। तो एक गीत जैसा क़िस्सा यहाँ पर अपनी पहली पोस्ट के रूप में -
(भोजपुरी) में है -

एगो रहलन राज
बोवलन खाजा।
तब जामल।
गइनी सन काटे।

मीर कटलन मीर बोझा
दादा कटलन तीन बोझा
आ हम दू तीन गो बतिया।

गइनी स बेचे ।

मीर बेचलन मीर बोझा
दादा बेचलन तीन बोझा
आ हम देखते रह गइनी

मीर के मिलल मीर पईसा
दादा के मिलल तीन पईसा
आ हमरा एगो अधेला

गइनी स खाए।

मीर खइलन मीर रोटी
दादा खइलन तीन रोटी
आ हम एगो टुकड़ा।


फेर गइनी स खेत में
तब ले खेतवाह आ गइल

मीर के मरलस मीर लाठी
दादा के मरलस तीन लाठी
आ हमरा के उठा के पटक देलस।

मीर लगलन रोए
दादा लगलन टोए
आ हम दाँत चियार देनी।


( जो लोग भोजपुरी नहीं समझ सकते वो लोग You Tube पर जा के ek rahen meer ek rahen beer टाइप करें। अमिताभ का एक अल्बम आया था अवधी भाषा में)

सोमवार, 30 मार्च 2015

कोई लाके मुझे दे

बच्चों, ये ब्लॉग सिर्फ आपके लिए है. इसमें होगा खूब मज़ा, खूब मस्ती, खूब हँसी और खूब सारा नॉलेज भी. अरे-अरे डरने की कोई बात नहीं! पढ़ाई-वढ़ाई नहीं, सिर्फ खेल-खेल में हम कुछ सीखेंगे...आगे जैसा-जैसा आप कहेंगे, हम ब्लॉग में और भी कई चीज़ें जोडेंगे, घटाएंगे और फेरबदल करेंगे...लेकिन अभी दामोदर अग्रवाल जी की एक कविता, जो आपलोगों को खूब पसंद आयेगी-

कोई लाके मुझे दे
कुछ रंग भरे फूल
कुछ खट्टे-मीठे फल
थोड़ी बाँसुरी की धुन
थोड़ा जामुन का जल ...कोई लाके मुझे दे

एक सोना जड़ा दिन
एक रूपों वाली रात
एक फूलों भरा गीत
एक गीतों भरी बात... कोई लाके मुझे दे

एक छाता छाँव का
एक धूप की घड़ी
एक बादलों का कोट
एक दूब की छड़ी...कोई लाके मुझे दे

एक छुट्टी वाला दिन
एक अच्छी सी किताब
एक मीठा सा सवाल
एक नन्हा सा जवाब... कोई लाके मुझे दे