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बुधवार, 30 सितंबर 2015

गधे की फोटो (हास्य कथा)

(अपने जीवन की सच्ची घटना पर आधारित यह कहानी मैंने बारह-तेरह साल की उम्र में लिखी थी. कहानी 1994 में राजस्थान पत्रिका प्रकाशन की बाल पत्रिका बालहंस में प्रकाशित हुयी थी. इसे बाद में इसी प्रकाशन से 2010 में "हास्य कथाएँ" नामक हास्य कथा संकलन में सम्मिलित करके प्रकाशित किया गया.)

यह उस समय की बात है जब हमलोग मगरवारा में रहते थे. यह उन्नाव जिले के अंतर्गत आने वाला छोटा सा स्टेशन है. मेरे पिताजी यहाँ स्टेशन मास्टर थे और हमलोग उनके साथ रेलवे कॉलोनी में रहते थे.

मगरवारा गाँव के बीच स्थित है, इसलिए यहाँ गाँव जैसा ही वातावरण है. रेलवे कॉलोनी के लोग उस समय बहुत ही प्रेम से मिलजुलकर रहते थे. 

एक बार की बात है, कहीं से एक गधा चरते-चरते रेलवे कॉलोनी में आ पहुँचा. तभी किसी लड़के ने उस गधे के गले में बंधी पतली सी रस्सी पकड़ ली. गधे को इस बात की खबर भी न लगी कि उस लड़के ने उसे पकड़कर बाँध दिया है और वह आराम से घास चरता रहा.

अपने बरामदे में खड़ी होकर मैं यह दृश्य देख रही थी. वो लड़का गधे को बाँध कर चला गया था. मुझे उस गधे की फोटो खींचने की बात सूझी. तभी उधर से रमेश चाचा जो कि मगरवारा स्टेशन पर पोर्टर थे, आ पहुँचे. मैंने उनसे कहा 'चाचाजी, ज़रा आप इस गधे को पकड़े रहिये. मैं इसकी फोटो खीचूँगी.' 

रमेश चाचा ने आश्चर्य से पूछा 'गधे की फोटो?'

'हाँ, आप इसे पकड़िये तो मैं अभी कैमरा लाती हूँ' कहते हुए मैं तुरंत अंदर घर में आई और दीदी से अपने मन की बात कही. दीदी पहले तो हँसी, फिर कैमरा ले जाने की अनुमति दे दी. मैं कैमरा लेकर बाहर आ गयी. पीछे-पीछे मेरा भाई भी आ गया. बाहर निकली तो देखा कि रमेश चाचा गधे को पकड़े हुए हैं. मैंने खुश होकर कैमरा ठीक करना शुरू कर दिया. 

मुझे कैमरा लिए देखकर कुछ बच्चे और कुछ उधर से निकलने वाले ग्रामीण मुसाफिर भी उत्सुकतावश रूककर देखने लगे.तभी एक बच्चे ने पूछा, "दीदी, हम भी पकड़ लें गधे को." मैं समझ गयी कि गधा तो इनसे रुकने से रहा, असल में ये गधे के साथ अपनी फोटो खिंचवाना चाहते हैं. खैर, मैंने हाँ कर दी और कैमरा ऑन करके फोकस लगाने लगी.

उधर गधे जी ने जब अपने आसपास जमा भीड़ को देखा तो भड़क गए. मैंने चिल्लाकर कहा, "अरे चाचा जी, उसे ज़रा ज़ोर से पकड़िये, रस्सी पतली है. तुड़ाकर भाग जाएगा." चाचाजी ने उसे और मजबूती से पकड़ लिया और मेरी बात सुनकर और लोग भी गधे को पकड़ने आ गए. 

अब मेरे कैमरे में फ्लैश वाली बत्ती जल चुकी थी. मैंने फोकस भी ठीक कर लिया था. कैमरे के फ्रेम में उस समय वह गधा और उसे पकड़े हुए 12-13 आदमी और बच्चे दिखाई पड़ रहे थे, जिन्हें दरअसल अपनी फोटो खिंचवाने का ज़्यादा शौक था. अब वे लोग गधे को मजबूती से पकड़े हुए थे. कुछ लोग झुककर उसका पैर पकड़े थे, कुछ लोग पूंछ और कुछ लोग गले में बंधी रस्सी. गधे ने अपनी जान आफत में देखकर जोर-जोर से चिल्लाना आरम्भ कर दिया. लेकिन फोटो खिंचवाने वालों को इसकी कोई फ़िक्र नहीं थी. 

"रेडी" कहकर जैसे ही मैंने अपने कैमरे का बटन दबाया तो स्थिति यह बनी कि गधे को छोड़कर सब एकदम सीधे खड़े हो गए और गधा रफूचक्कर हो लिया.

जब फोटो बनकर आई तो मैंने सर पीट लिया. जिसकी फोटो खींचना चाहती थी, वह गधा तो उसमें था ही नहीं, हाँ, बारह-तेरह आदमी और बच्चे ज़रूर खींसे निपोरे सावधान खड़े थे. फिर भी वह फोटो आज भी सबको गधे की फोटो कहकर ही दिखाई जाती है :) 

-आराधना चतुर्वेदी मुक्ति 

सोमवार, 14 सितंबर 2015

नन्दी की पीठ का कूबड़ (कहानी)

(बच्चो, आज प्रस्तुत है एक कहानी हमारे मित्र चंदन कुमार मिश्र के सौजन्य से)
कहानीकार- दामोदर धर्मानंद कोसाम्बी
हिन्दी अनुवाद: अरविन्द गुप्ता
(प्रोफेसर कोसम्बी द्वारा रचित बच्चों के लिए शायद यह एक मात्र कहानी है। यह कहानी उन्होंने अपने सहयोगी दिव्यभानुसिंह चावडा को, 1966 में, अपनी असामयिक मृत्यु से कुछ दिन पहले ही भेजी थी। यह कहानी किसी भी भाषा में पहली बार प्रकाशित हो रही है।)
(गाँव के वार्षिक मेले का अवसर है। उसमें जानवरों की खरीद-फरोख्त का अच्छा कारोबार होगा। गाँव के मुखिया का बेटा राम, सुबह-सुबह अपने नन्दी बैल को चराने ले जाता है। शाम को नन्दी जानवरों की जलूस की अगुवाई करेगा। जंगल के एक छोर पर तालाब है। धीरे-धीरे वहाँ बूढ़े पीपल के पेड़ के नीचे राम के बहुत से मित्र इकट्ठे हो जाते हैं। वे सभी एक सवाल का जवाब खोजने की कोशिश करते हैं – भारतीय बैलों के पीठ पर कूबड़ क्यों होता है?)

रामः ‘नन्दी! यह बताओ कि बैलों की पीठ पर ही कूबड़ क्यों होता है? जरा भैंस को देखो। और उधर घोड़े को देखो। उनकी पीठ तो एकदम चपटी है।’
तभी राम का कुत्ता मोती दौड़ता और हाँफता हुआ आया। मोती ने कहा, ‘भौं, भौं! क्या तुम्हें पता है – जब मैं बिल्ली को पकड़ने दौड़ता हूँ तो वो अपनी पीठ मेहराब जैसे ऊपर उठाती है। नन्दी की पीठ के साथ भी शायद यही हुआ होगा। उसे किसी ने डराया होगा।’ उसके बाद मोती और नन्दी पानी पीने चले गए।
‘टर! टर! टर!’ मेंढक पानी से कूदते हुए टर्राया। ‘हमारे बहादुर नन्दी को डराना काफी मुश्किल काम है। कुछ दिन पहले शेर ने पूरा दम लगाया फिर भी उसे भगा नहीं पाया। अब सब देखो – मैं कैसे फूलकर कुप्पा होता हूँ। मुझे लगता है कि नन्दी ने मेरी तरह ही अपने कूबड़ में हवा भर ली होगी।’
यह सुनकर बूढ़ा नाग, पीपल के पेड़ की जड़ के बिल में से बाहर निकला। ‘हिस! हिस! उसने फुँफकारते हुए कहा, ‘हवा से सिर्फ छाती भरती है, पीठ नहीं। मैंने एक बार मोटा चूहा निगला और फिर मैं पूरे हफ्ते सोता रहा। तब मेरा शरीर भी बीच में फूल गया था। नन्दी ने भी जरूर कोई मोटी चीज निगली होगी।’
‘हा! हा! हा!’ भालू चीखते हुए जंगल में से बाहर आया। ‘नन्दी हमेशा छोटी-छोटी चीजें ही खाता है। तुम्हें क्या लगता है–  उसने एक बड़ा कद्दू निगला है? पिछले साल मैंने मधुमक्खियों के छत्ते से शहद चुराया था। उसके बाद मधुमक्खियों ने मुझे जम कर काटा। उससे मेरा चेहरा एक तरफ बुरी तरह से फूल गया। मुझे लगता है कि हमारे नन्दी को भी किसी ने काटा होगा।’
इसी बीच बंदर भी पीपल के पेड़ से कूदता हुआ नीचे आया। ‘खों! खों! खों! देखो इस पेड़ के फल खाने के बाद मेरे नीचे के गाल किस तरह फूल जाते हैं। नन्दी घास चरता है। उसने जरूर उस घास को अपने कूबड़ में उसे छिपाया होगा। छिपी घास को ही वो बाद में धीरे-धीरे करके चबायेगा। देखो वो कैसे घास की जुगाली कर रहा है?’
‘तुम आखिर एक लालची बंदर की तरह ही बोले,’ राम ने कहा। ‘देखो, नन्दी का कूबड़ हमेशा एक-जैसा ही रहता है। फल खाने के बाद तुम्हारे गाल एकदम पिचक जाते हैं। पर नन्दी का कूबड़ बिल्कुल एक-समान ही रहता है।’
नन्दी ने कहा, ‘मुझे लगता था कि जिस प्रकार सभी बैलों के सींग होते हैं वैसे ही सभी बैलों का कूबड़ भी होता होगा। कल मुझे जिला स्तरीय प्रदर्शनी में प्रथम पुरस्कार मिला। वहाँ पर यूरोप से लाये कुछ बैल भी थे। मुझे वो बैल कुछ अजीब लगे! उनके न तो सींग थे और उनकी पीठ भी एकदम चपटी, सपाट थी। यूरोप के बैल एक-दूसरे से फुसफुसाकर कह रहे थे, ‘जरा देखो उस कुबड़े बैल को, जिसे पहला ईनाम मिला है! मुझे इस सबके पीछे मनुष्य की ही कारिस्तानी नजर आती है। पीठ में कूबड़ के कारण बैल पर हल का जुआ अच्छी तरह बैठता है। कूबड़ के कारण ही मैं हल और बैलगाड़ी को बेहतर तरीके से खींच पाता हूँ। यूरोप के बैलों ने मुझे बताया – उनके देशों में जुताई के लिए पहले घोड़ों का उपयोग होता था। अब खेतों की जुताई मशीनों द्वारा की जाती है।’
राम ने इससे असहमति जतायीः ‘इस पुस्तक के अनुसार भगवान शिव नन्दी की सवारी करते हैं। भगवान ने नन्दी की पीठ पर कूबड़ इस लिए बनाया जिससे वो उसपर झुककर कुछ आराम कर सकें। देखो, इस चित्र में भगवान कितनी आसानी से नन्दी पर सवारी कर रहे हैं। हमारे गाँव का कुलदेवता तो स्वयं यह पीपल का पेड़ है। चलो, अब पीपल के पेड़ से ही नन्दी के कूबड़ का कारण पूछते हैं।’
बूढ़े पीपल के पेड़ ने उत्तर दियाः ‘नन्दी ने सही ही कहा। मनुष्य ने बैलों को अपने लिए बनाया है। इंसानों ने ही मोती जैसे कुत्ते बनाए हैं। इंसानों ने ही धान और गेहूँ बनाया है। साथ-साथ, मनुष्य ने खुद को भी बनाया है।’
रामः ‘यह कैसे सम्भव है? हमारा नया घर पिछले वर्ष बना था। कई लोगों ने उसे मिलकर बनाया था। उसके लिए पेड़ों को काटा गया। फिर लट्ठों और तख्तों को लम्बाई में काटा गया। इसके लिए कई लोगों को मेहनत करनी पड़ी। उसके बाद पूरे फ्रेम को कीलें ठोक कर जोड़ा गया। मैंने छत पर फूस बिछाने में अपने पिताजी की मदद की। परंतु हमने नन्दी को कैसे बनाया? वो छोटे बछड़े जैसा पैदा हुआ था और तभी से उसके पीठ पर कूबड़ है। दो साल पहले मोती एकदम छोटा पिल्ला था। मैंने बस इतना ही किया। माँ से निगाह बचाकर अपनी थाली में से मोती को कुछ अपना खाना खिलाया। हमने तो मोती को कुत्ता नहीं बनाया। अनाज पैदा करने के लिए हमने खेत में सिर्फ बीज बोए। इससे, बस चार महीने में हमें उसी प्रकार का बहुत सारा और अनाज मिला। हमने तो वो अनाज नहीं बनाया।’
पीपल का पेड़ः ‘राम तुम एक बहुत होशियार लड़के हो। यही सीखने का अच्छा तरीका है – बस प्रश्न पूछते रहो। तब तक प्रश्न पूछो जब तक तुम सच की जड़ तक नहीं पहुँचो। अब ध्यान से सुनो। मैं तुम्हें वही बताने जा रहा हूँ जिसे मैंने खुद अपनी आँखों से देखा है। आज से हजारों साल पहले मनुष्य लगभग उसी तरह रहते थे जैसे आज तुम्हारा मित्र बंदर रहता है। वे भोजन और फलों के लिए पेड़ों पर चढ़ते। वो बेर और कुकुरमुत्ते तोड़ते। वे जमीन के अंदर से कंद खोदकर निकालते। मनुष्य बिल्कुल भालू की तरह ही शहद इकट्ठा करते। वे कभी-कभी भालू की तरह ही अपने पंजों से मछलियों का शिकार करते। वे मांस के लिए अन्य जानवरों का शिकार करते। तब न तो आग थी, न हल और न ही घर और झोपडि़याँ। तब गाँव भी नहीं थे। फिर ग्राम देवता का सवाल ही पैदा नहीं होता है। लोग इधर-उधर से भोजन एकत्र कर अपना जीवन चलाते थे। परंतु अब लोग अपना भोजन उगाते हैं।’
रामः ‘पर अगर हम इस प्रकार जी सकते थे तो फिर हमने क्यों भोजन उगाया? देखो मेरे पिता और बड़ा भाई खेतों पर कितनी मेहनत करते हैं। क्या हम इतनी मेहनत किए बिना जिन्दा नहीं रह सकते?’
पीपल का पेड़ः ‘हर समय पर्याप्त मात्रा में भोजन इकट्ठा करना सम्भव नहीं होता है। कभी-कभी सूखा पड़ता है जिससे नदी-नाले सूख जाते हैं। मछलियाँ मर जाती हैं। शिकारी जानवर दूर-दराज चले जाते हैं। फल भी नहीं मिलते हैं। एक बात और है – पूरे साल भर चीजें इकट्ठी करना सम्भव नहीं होता है। इंसान को भोजन इकट्ठा करके उसे संभाल-संजोकर रखना सीखना पड़ा। बारिश के बाद की फसल अक्सर बहुत अच्छी होती है। आप पूरे साल उस फसल का अनाज खा सकते हैं। अगर अधिक उपज होगी तो उससे ज्यादा लोग जीवित रह पायेंगे। मैं अपनी सबसे ऊपर की टहनी से पाँच बड़े गाँवों को देख सकता हूँ। पुराने जमाने में इस पूरे इलाके में मुझे पाँच लोग भी नजर नहीं आते थे।’
रामः ‘ठीक है। पर लोगों ने मेरे मोती जैसे कुत्ते क्यों बनाए?’
पीपल का पेड़ः ‘पुराने जमाने में शिकार के समय भेड़िये भी आदमियों की तरह शिकार का पीछा करते थे। यह देख मनुष्यों ने कुछ भेडि़यों के बच्चों को पाला। इनमें से अधिकतर बड़े होकर दुबारा जंगली भेड़िये बने और चले गए। परंतु उनमें से कुछ मनुष्यों के साथ रहने लगे। वे लोगों के लिए शिकार का पीछा करने लगे। इसके बदले में लोग उन्हें बचा हुआ मांस और हड्डियाँ खाने को देते। इस प्रकार जंगली भेड़िये पालतू बने। अब हम उन्हें कुत्ते के नाम से जानते हैं।’
रामः ‘मुझे खुशी है कि लोगों ने ऐसा किया। अगर मोती नहीं होता तो मैं भला क्या करता? परंतु नन्दी की पीठ पर कूबड़ किस तरह आया? शायद वो शुरू से ही था। मुझे अभी तक इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिला।’
पीपल का पेड़ः ‘मनुष्यों के लिए जंगली हिरणों का लगातार पीछा करना काफी कठिन काम था। गाय-बैल भी जंगली जीव थे। परंतु वो धीमी गति से चलते थे। मनुष्य मांस के लिए उनका पीछा करते। कुछ समय बाद उन्होंने मोती की तरह ही कुछ गाय-बैल के बछड़ों को भी पालतू बनाया। इसके लिए उन्होंने सबसे तगड़े बछड़ों को चुना। उनमें से कुछ की पीठ पर छोटा कूबड़ था। कूबड़ के कारण लोगों को अधिक मांस मिलता था। इसके लिए वो लगातार कूबड़ वाले बछड़ों को चुनते रहे और उन्हें भरपेट खाने को देते रहे। इससे धीरे-धीरे कूबड़ बड़ा होने लगा। मनुष्यों को कूबड़ वाले गाय-बैलों को पालतू बनाना ज्यादा आसान लगा। गायें दूध देतीं। अब धीरे-धीरे लोग शिकार करने की बजाए गाय-बैल पालने लगे। इस तरह धीरे-धीरे नन्दी जैसे, बड़े कूबड़ वाले बैल विकसित हुए।
रामः ‘यह तो बहुत होशियारी की बात है। पर यह अनाज कैसे विकसित हुए?’
पीपल का पेड़ः ‘सदियों पहले मैंने लोगों को भूख मिटाने के लिए पत्ते और घास के बीज खाते हुए देखा था। इसके अलावा खाने को कुछ और नहीं था। धीरे-धीरे उन्होंने सबसे मोटे बीजों को छाँट कर अलग किया। सभी घासें एक-जैसी नहीं होती हैं। लोगों ने पाया कि अच्छी घासें सबसे मुलायम और नर्म मिट्टी में ही अच्छी उगती हैं। मुलायम मिट्टी सभी जगह नहीं मिलती है। परंतु अगर कंद को एक नुकीली छड़ से खोदकर निकाला जाए तो अगले साल उस जगह पर अच्छी घास उगेगी। इसी कारण लोगों ने मोटी घास के बीजों को बोने के लिए जमीन में गड्ढे खोदने शुरू किए। लोग अगली फसल के लिए हमेशा सबसे मोटे बीज ही बोते।’
रामः ‘हम अनाज के बीजों को तो इस तरह नहीं बोते हैं। हम हल से खेत जोतते हैं। लोगों ने हल का उपयोग करना कैसे सीखा?’
पीपल का पेड़ः ‘इसे सीखने में उन्हें बहुत समय लगा। पहले उन्होंने नुकीली छड़ से जमीन की सतह को खुरचा। परंतु उससे कोई खास फायदा नहीं हुआ। वैसे, कच्चा अनाज खाने में बहुत अच्छा नहीं होता। इसके लिए इंसान ने आग की जानकारी हासिल की। शुरू में उन्हें जंगल की भीषण आग से डर लगता था। वे आग और जंगली जीवों को देखकर डर से भागते थे। फिर उन्होंने खाना पकाना सीखा। वे आग से मिट्टी के बर्तन पका पाये। जमीन की गहरी जुताई के लिए उन्हें ऐसी चीज की जरूरत थी जो अधिक ताकत से खींच सके। तब उन्होंने हल के टेढ़े फल को खींचने के लिए बैलों का इस्तेमाल करना शुरू किया। हल को खींचने के लिए मनुष्य को बड़े जानवरों की जरूरत थी। इसलिए उन्होंने जानवरों को मांस के लिए मारना बंद किया। इस प्रकार उन्हें नन्दी जैसे बढि़या और ताकतवर बैल मिले।
रामः ‘जरा कल्पना करो मेरे नन्दी को मारने की! कितनी बेवकूफी की बात है। पर अभी आपने मनुष्य द्वारा खुद अपने निर्माण का जिक्र किया था।’
पीपल का पेड़ः ‘मैंने अभी तुम्हें बताया कि किस प्रकार मनुष्य को आग ने भयभीत करना बंद किया। शुरू में लोग आग को भगवान के रूप में पूजते थे। धीरे-धीरे इंसानों ने आग बनाना सीखी। इसके लिए उन्होंने दो सूखी लकडि़यों को आपस में रगड़ा। फिर उन्होंने मुझे और नन्दी को पूजना शुरू किया। हमने मनुष्य को भोजन दिया। मेरे फल अभी भी खाने योग्य हैं। परंतु अब लोगों को मेरे छोटे भाई अंजीर के फल ज्यादा स्वादिष्ट लगते हैं। अंजीर आकार में बड़ी और मीठी होती हैं। वैसे अंजीर का पेड़ छोटा और कमजोर होता है। उसे अच्छी मिट्टी की जरूरत होती है। और साथ में ढेर पानी की भी। जंगल की सफाई, कटाई हुई। लेकिन मैं भाग्यवश बच गया। कई बार जंगल में आग लगी और मेरे परिवार के तमाम सदस्य मारे गए। मैं कई बार बाल-बाल बचा। लोग आज भी आग, नन्दी और मेरी पूजा करते हैं। पर अब यह पूजा-उपासना कम हो रही है। हमने मनुष्य को नहीं बनाया। मैं यह बात स्पष्ट करना चाहता हूँ।’
रामः ‘फिर किसने बनाया?’
पीपल का पेड़ः ‘वर्तमान मनुष्य को खुद उसने ही बनाया है। शुरू में वो छोटा और बंदर जैसा अच्छा दोस्त था। परंतु वो निस्सहाय था। आग के बाद उसने धातुओं को खोजा। पहले तांबा। फिर लोहा। उससे पहले मनुष्य ने पत्थरों के औजार बनाए। लोगों ने शिकार के लिए तीर-कमान बनाए। उन्होंने भोजन को संचित कर सुरक्षित रखने के लिए टोकरियाँ और चमड़े के थैले बनाए। मछलियाँ पकड़ने के लिए जाल बनाए। इस प्रकार लोगों को अधिक भोजन मिल पाया। खेती-बाड़ी की कठिन मेहनत ने मनुष्य को बलवान बनाया। लोग अपने सिर पर भारी बोझ ढोने लगे। इस कारण लोग सीधे खड़े होकर चलने लगे। लोगों ने झोपडि़याँ और घर बनाये। वे कपड़े पहनने लगे। पुराने जमाने में कई बड़े-बूढ़े मनुष्य भी मेरी छाँव तले नंगे रहते थे। बिल्कुल वैसे ही जैसे तुम बचपन में नंग-धड़ंग घूमते थे।’
रामः ‘गर्मी के दिनों में मुझे अभी भी कपड़े बिल्कुल नहीं सुहाते हैं। परंतु मेरी माँ मुझे नंग-धड़ंग दौड़ने से मना करती हैं। अब मुझे आप एक बात और बतायें। यह भगवान कब आये?’
पीपल का पेड़ः ‘पहले लोगों ने चीजों के उगने के बारे में जाना। उन्होंने उगती चीजों को अपने उपयोग के लिए इकट्ठा किया। इससे लोगों को लगा कि सभी चीजों को कोई महान माता जन्म देती है। हम अभी भी कहते हैं, ‘पृथ्वी हमारी माता है।’ फिर इंसान ने इकट्ठी की गई चीजों से कहीं ज्यादा चीजें खुद बनाना सीखीं। तब उसने सोचा, ‘मुझे भी किसी ने बनाया होगा?’ तब इंसानों ने भगवान को जन्म दिया। लोगों ने कहा, ‘भगवान ने हर चीज बनायी है।’ परंतु मुझे असली सच पता है। मैं मनुष्य के सभी भगवानों से अधिक बूढ़ा हूँ। मैंने मनुष्य को स्वयं खुद का निर्माण करते हुए देखा है। उसे अभी इस काम को और आगे बढ़ाना है। वो कभी-कभी मनुष्य जाति के अन्य लोगों के साथ बहुत क्रूर व्यवहार करता है।’

अब शाम ढलने लगी थी। राम की माँ एक टोकरी में लाल फूल लेकर आयीं। उन्होंने टोकरी को तालाब के किनारे रखा। फिर उन्होंने बूढ़े पीपल के पेड़ के सामने झुक कर उसका नमन किया। राम की मित्र मंडली वहाँ से खिसक ली। माँ ने कहा, ‘राम, इधर आओ। जल्दी तैयार हो। आज रात को नन्दी को जलूस में सबसे आगे रहना है। तुम्हें पता है कि नन्दी अन्य गाय-बैलों से पहले पैदा हुआ था। चलो, नन्दी को घर ले चलकर उसे सजायें।’

गुरुवार, 27 अगस्त 2015

कुत्ते और सियार (कहानी)

बच्चो, आज आपको एक मज़ेदार लोककथा सुनाऊँगी. लोककथा उसको कहते हैं जो नानी-दादी, मम्मी-पापा आदि हम बच्चों को सुनाते हैं, लेकिन वह कहीं लिखी नहीं होती. ये कहानी मुझे मेरे बाऊ यानि पापा ने सुनायी थी. हो सकता है कि आपने ये किस्सा किसी और रूप में पहले भी सुना हो. कुत्ते और सियार एक ही श्रेणी के जानवर होते हैं. ये लोककथा इस कल्पना पर आधारित है कि सियार और कुत्ते अलग-अलग कैसे रहने लगे- कुत्ते शहर में और सियार जंगल में.

बहुत पहले कुत्ते और सियार एक साथ जंगल में रहा करते थे. साथ-साथ रहने के कारण अक्सर खाने की कमी हो जाया करती थी. वो लोग जब भी इंसानों को देखते उनके मन में जिज्ञासा पैदा होती कि ये कैसे रहते हैं? क्या खाते हैं? उन्हें लगता कि शहर में खूब ढेर सारी खाने की चीज़ें होती हैं और अगर हम बारी-बारी से जाकर उन्हें चुरा लाएं, तो हमारी खाने की समस्या दूर हो सकती है. पर शहर जाने का जोखिम कोई नहीं उठाना चाहता था. उनको आदमियों से डर लगता था.
कुत्ते थोड़े ज़्यादा तगड़े थे. इसलिए एक दिन तय हुआ कि कुत्ता लोग शहर जाकर खाने की चीज़ें लायेंगे. अगर इसके लिए आदमियों को काटना भी पड़े तो कोई बात नहीं. तो अपनी पूरी हिम्मत जुटाकर कुत्ते शहर की ओर निकल पड़े. लेकिन शहर जाकर कुत्तों को आदमियों से प्यार हो गया. इंसानों ने कुत्तों को अपने यहाँ प्यार से रख लिया. जिन्हें घर में जगह नहीं भी मिली, वो भी गलियों में रहकर कुछ न कुछ खाने को पा जाते थे. 
इंसानों से इतना प्यार और खाने की चीज़ें पाकर कुत्तों ने उनके यहाँ चोरी करके वापस जंगल जाने का विचार त्याग दिया. उन्हें लगा कि अब इंसानों के यहाँ चोरी करना, उन्हें धोखा देना हुआ. लेकिन दूसरी ओर उन्हें सियारों से किया अपना वादा भी याद था. कुत्ते बड़े असमजंस में पड़ गए कि आखिर वो करें तो क्या करें? आखिर में कुत्तों ने तय किया कि जब भी सियार अपने काम के लिए पूछेंगे तो कुत्ते उनको डाँटकर चुप करा देंगे. 
तब से जब भी सियार जंगल की ओर से अपने काम के बारे में पूछते हैं "हुआऽऽऽऽ?? हुआऽऽऽऽ??" तब इधर शहर से कुत्ते उन्हें डाँटकर कहते हैं "भक् भक्"...:) 

है न, मज़ेदार किस्सा ?

बुधवार, 29 जुलाई 2015

दो तितलियाँ (कहानी)


गर्मी की छुट्टियाँ शुरु हो गयी थीं हर साल की तरह इस बार भी मिथली को अपने दादा - दादी के पास गाँव जाना था. उसकी माँ पैकिंग मे लगी थी मिथली ने भी अपनी गुड़िया, खिलौने, टॉफ़ी, चॉकलेट और लूडो पैक करवा लिया था. कल सुबह की ट्रेन से उसे दिल्ली से अपने गाँव जाना था. रात को खाने के बाद माँ ने उसे जल्दी सोने को कहा वह बिस्तर पर लेट तो गयी लेकिन गाँव जाने की खुशी मे उसे नींद नहीं आयी वह बार बार माँ को आवाज़ लगा कर अपना सामान गिनवाती और पूछती कुछ छूटा तो नहीं. बिस्तर पे लेटे लेटे उसे याद आया कि उसे अपनी बेस्ट फ्रेंड तितली के लिये ग्रीटिंग कार्ड बनाना था. वह झट के उठ के आर्ट की कापी का एक पेज, पेंसिल ,रबर, स्केल और कलर ले आयी उसने पेज को कार्ड की तरह फोल्ड किया और उसपे बहुत सारे फूल, तितलियाँ और आसमान मे उड़ती चिड़ियाँ बना डालीं बीचोंबीच मे उसने एक लड़की बनाई और अपने चमकीले रंगों से सब को जीवंत कर दिया . कार्ड के एक कोने पर उसने रंगीन पेंसिल से लिखा To my best freind titli और नीचे दूसरे कोने पे उसने लिखा from your best freind mithli. Engish के Exam की तरह मिथली ने कार्ड पर भी friend की स्पेलिंग गलत ही लिखी थी.

आज सुबह वह माँ की एक आवाज़ मे ही उठ गयी जल्दी जल्दी नाश्ता कर के फूलो वाली पीली फ्राक पहन के गुड़िया वाला बैग कंधों पे लटका के तैयार हो गयी. माँ पापा के साथ वह स्टेशन पहुँची ट्रेन मे सब अपनी सीट पर बैठ गये मिथली हर जाती हूई ट्रेन और लोगों को हाथ हिला कर विदा करती जैसे सब उसके अपने हों. कुछ ही देर मे उसकी गाड़ी भी चल दी सूरज ढलने से पहले वह अपने गाँव पहुँच गयी घर पहुँचते ही दादा ने उसे गोद मे उठा लिया वह चिड़िया की तरह चहकती हूई सफर का सारा किस्सा सबको सुना रही थी कुछ ही पलों मे पूरे घर मे वह अपने पावँ के निशान बना आई थी. वह अपने बैग से कुछ निकाल रही थी कि तभी बाहर से आवाज़ आयी मीथली मीथली ... अपनी बेस्ट फ्रेंड तितली की आवाज़ सुनकर वह बाहर दौड़ी चली आई लेकिन मीथली को देखते ही उसका खिला हुआ गुलाबी चेहरा पीला पड़ गया. तितली व्हील चेयर पर बैठी हाथ मे आम की टोकरी लिये मुस्कुरा रही थी उसने आम की टोकरी मीथली की तरफ बढ़ाते हुए कहा, बाबा से कह के ताज़े मंगवाये हैं. तितली की बात काटते हुए मीथली बोल पड़ी , तितली यह क्या हुआ ? तुम व्हील चीयर पे क्यों ? तितली कुछ बोलती कि दादा जी बोल पड़े , कुछु महिने पहले एक सड़क हादसे मे तितली को चोट लग गयी थी इसलिए वह अब चल नही पाती.

मीथली को यह जानकर बहुत दुख हुआ अब तितली उसके साथ दौड़ नहीं सकती थी खेल नहीं सकती थी शाम को दोनो ने खूब बातें की मीथली ने अपनी दोस्त को ग्रीटिंग कार्ड दिया चाकलेट दी अपने खिलौने और कहानी की किताब दिखाई . रात को तितली मीथली से घर आने का वादा ले के अपने घर चली गई. अब रोज़ दोनों मिलती कहानियाँ पढ़ती ,गुड़िया खेलतीं अपने अपने स्कूल की बातें बतातीं , लेकिन मीथली बाग मे खेलना चाहती थी वह फूल चुनना चाहती थी उसका मन करता था आम तोड़ने का, तितलियाँ पकड़ने का ऊँच नीच खेलने का पूरे गाँव मे दौड़ लगाने का. धीरे धीरे वह दूसरे बच्चों के साथ खेलने लगी, तितली उसे खेलते देखती रहती. धीरे धीरे मीथली अपनी दोस्त तितली से दूर जाने लगी ,वह अब तितली को बिना लिए ही दूसरे बच्चों के साथ खेलने चली जाती लेकिन फिर भी तितली उसके पीछे पीछे उस जगह पहुंच जाती.

एक दिन फूल तोड़ने और रंग बिरंगी चमकीली तितलियाँ पकड़ने के लिए बच्चों के कहने पर वह कल्लन सेठ के बगीचे में दीवार फांद कर कूद गई उसकी दोस्त तितली ने उसे मना भी किया लेकिन उसने नहीं सुना . थोड़ी ही देर मे बगीचे से कुत्तों के भौकने और बच्चों के चीखने चिल्लाने की आवाज़े आने लगीं , सब बच्चे दीवार फांद फांद कर भाग गये लेकिन मीथली सबसे छोटी होने की वजह से बड़ी मुशकिल से कुत्तों से बच के दीवार पर चढ़ पायी , बगीचे के इस पार दीवार ज्यादा ऊँची थी उसके पाँव मे काँटा भी चुभा हुआ था वह इतना ऊँचा अब कूद नहीं सकती थी . अपनी दोस्त तितली को देखकर वह फफक फफक कर रोने लगी , तितली ने अपनी व्हील चेयर दीवार से सटा दी और उस पर पैर रखकर उतरने को कहा . मीथली उस व्हील चेयर की मदद से नीचे उत्तरी तितली ने उसके पाँव का काटा निकाला , मीथली को अपनी गलती का एहसास हो गया था वह समझ गयी थी कि तितली ही उसकी सच्ची दोस्त है और उसने तितली से उसकी बात न मानने के लिये माफी मांगी और हमेशा बेस्ट फ्रेंड बने रहने का वादा किया. कुछ माह के इलाज के बाद तितली ठीक़ हो गयी और फिर से दोनों एक घर से दूसरे घर कूदने लगीं , दादा ने दोनों को दौड़ा कर पकड़ा और बोले मैने तो आज दो तितलियाँ पकड़ लीं ,यह सुनकर दोनों खिल खिला के हँस पड़ी.

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ज़ैतून ज़िया, लखनऊ
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06 जुलाई 1989 को हरदोई में जन्मी ज़ैतून ज़िया ने महिला विद्यालय इंटर कॉलेज से 10वीं की परीक्षा पास करने के बाद लाल बाग महिला इंटर कॉलेज लखनऊ से 12वीं की परीक्षा पास किया. उसके बाद कानपूर विश्वविद्यालय से ज़ूलॉजी, बॉटनी और केमिस्ट्री के साथ इन्होने स्नातक किया और इंटीग्रल यूनिवर्सिटी से बी.एड करने के बाद कानपूर विश्वविद्यालय से ही इन्होंने एजुकेशन में स्नाकोत्तर पास किया. सेंट. थेरेसा हाई स्कूल में इन्होंने 6वीं से 10वीं तक जैविक विज्ञान शिक्षका के रूप में कार्य किया और फिलहाल ए जामिया मिलिया इस्लामिया से एम.फिल. कर रही हैं.


शनिवार, 2 मई 2015

पिता-पुत्र

(बच्चो, आज प्रस्तुत है मित्र हिमांशु पाण्डेय द्वारा रचित एक शिक्षाप्रद बाल कहानी। यह कहानी पहले भी 'रचनाकार' ब्लॉग पर प्रकाशित हो चुकी है।)

प्रातःकाल पिता ने अपने सुत को चूम जगाया।
सिर सहला उसको दुलार से अपनी गोद उठाया।
पास सटी फ़ुलवारी में ले उसको लगा घुमाने ।
फ़ूल-फ़ूल पर नाच रही तितलियाँ लगा दिखलाने।


घर में आज बहुत ही पहले प्यारा बेटा जागा ।
देखा छत पर शोर मचाता उड़कर बैठा कागा ।
पूछा, पूज्य पिताजी छत पर आया कौन हमारे?
बोला, यह कौवा है मेरे राजा-बेटा प्यारे ।


कुछ ही क्षण में वही प्रश्न फ़िर बच्चे ने दुहराया।
'बाबूजी यह कौन हमारे छत पर उड़कर आया?"
बड़े प्यार से कहा बाप ने, "यह कौआ है बेटा।
खुली हवा में फ़ुदक रहा है रह न सकेगा लेटा।


बेटे ने फ़िर उत्सुकता से वही प्रश्न दुहराया ।
बड़े प्यार से कहा पिता ने बेटा कौआ आया।
बार-बार पूछता रहा वह "कौन-कौन है आया?"
"कौआ है,कौआ है बेटे," पिता यही बतलाया।


बेटे का उत्तर देने में पिता न थका न हारा ।
उसको तो प्राणों से प्रिय था उसका पुत्र दुलारा।
कुछ ही दिन में बाप हो गया बुड्ढा गयी जवानी।
अब उसकी बुढ़िया देती थी उसको दाना-पानी।


बात एक दिन की है कोई दरवाजे पर आया ।
पूछा "कौन?" पिता ने बेटे ने तब नाम बताया।
कम सुनता था पूछ पड़ा फ़िर,"कौन द्वार पर बेटे?"
वह गुस्से में झल्लाया, "बुड्ढे रह चुपके लेटे ।


तुमको क्या चुपचाप कोठरी में न लेटने आता ।"
सह बूढ़ा एक ही बात को बार-बार दुहराता ।
जब भी कुछ पूछता जोर से डाँट पुत्र चिल्लाता।
"नाकों में दम किया, क्यों नहीं यह बुड्ढा मर जाता।"


देख पुत्र का ढंग बाप को हुई बहुत हैरानी ।
माथ ठोकने लगा उमड़ आया आंखों में पानी।
यह कैसा हो गया जमाना कौन किसे समझाये।
लाज-हया हो गयी विदा अपने हो गये पराये ।


कई बार बेटे को उसने अपने पास बुलाया ।
फ़िर तुरंत टेकते लकुटिया पास पुत्र के आया।
कहा,"सुनो तुम छोटे थे, था छत पर कौआ आया।
तुमने पूछा तो मैंने था कई बार बतलाया ।


मैने गुस्सा किया न मेरी जीभ थकी बतलाते ।
एक बार पूछा तो बेटे, तुम इतना गुस्साते ।
बाहर-भीतर दोनों से ही भला आदमी दीखो ।
प्यारे-पुत्र बड़े बूढ़ों का आदर करना सीखो ।


        
-हिमांशु कुमार पाण्डेय
सकलडीहा, चन्दौली (उ0प्र0) 232109
चिट्ठा : सच्चा शरणम 

रविवार, 26 अप्रैल 2015

चार आने की धूप (कहानी)

(बच्चो, आज आपके लिए एक कहानी पोस्ट कर रही हूँ, जिसे हमारे एक साथी नैय्यर इमाम सिद्दीकी ने लिखा है. इसमें कुछ शब्द आपको कठिन लगेंगे, तो उनके अर्थ कहानी के अंत में दे दिए गए हैं. इससे आप कुछ नए शब्द भी सीखेंगे और कहानी का मज़ा भी लेंगे. आपको ये कहानी निश्चित ही बहुत अच्छी लगेगी.) 


“बिल्ली को किस भाषा में ‘गातो’ कहते हैं”?

नींद से बोझल आँखों को मसलते हुए उसने अँधेरे में उस आवाज़ को टटोलने की कोशिश की जिसने उसे ठिठुरती सर्दी की गर्म रात में ख़ूबसूरत नींद से जगाया था.

बोलो ! “बिल्ली को किस भाषा में ‘गातो’ कहते हैं”?

नानू ! आपको भी आधी रात का ही वक़्त सूझता है सबक़ पूछने के लिए? आवाज़ पहचानते ही उसने गर्म लिहाफ़ के अन्दर से कसमसाते हुए कहा. मैं तो सबक़ सुनाने के लिए देर रात तक आपकी स्टडी में आपका इंतज़ार करता रहा पर आप आए ही नहीं तो मैं सोने चला आया.

मैं आधी रात में सवाल इसलिए पूछता हूँ कि इस वक़्त ज़हन बिलकुल साफ़ और शांत होता है. इस वक़्त ज़हन पर जो कुछ भी उकेरा जाता है वो पत्थर की लकीर की तरह अमिट हो जाता है, समझे !  अच्छा, ये बताओ फ़ारसी का सबक़ याद हुआ या नहीं?

उसने करवट बदलते हुए कहा, हाँ ! याद हो गया है नानू.

तो फिर ये बताओ कि ‘कुलाहे मन स्याह अस्त’ का उर्दू तर्जमा क्या होगा?

नानू ! इस बार उसने लिहाफ़ से ज़रा सा मुँह बाहर निकाल कर कहा, – ‘सब याद है पर अभी सब कुछ गुडमुड सा है. सुबह नाश्ते के वक़्त आपको सब कुछ सुना दूँगा.

अच्छा, तो अब तुम आराम से सो जाओ, सुबह नाश्ते के वक़्त मिलते हैं. नानू ने उसके गाल थपथपाते हुए उसके माथे पर बोसा दिया और लिहाफ़ ठीक से ओढ़ने की ताकीद करते हुए कमरे से बाहर निकल गए.

***
सुबह 8:30 बजे नाश्ते की टेबल पर सभी घरवाले इकट्ठे थे. छोटे मियाँ को हलवे के साथ बेमुरव्वती से इंसाफ़ करते देख अब्बा ने कहा कि, - ‘इतनी जल्दी क्या है, आराम से खाओ. हलवा कहीं भागा तो नहीं जा रहा.’ छोटे मियाँ भला कब चुप रहने वाले थे, तपाक से बोले, - ‘हलवा तो बेशक यहीं होगा, लेकिन आप ऑफ़िस चले जायेंगे. कई रोज़ से आप मेरी चीज़ें लानी भूल जा रहे हैं. आज तो मैं आपके साथ ही चलूँगा. आप दुकान से मुझे मेरी चीज़ें दिलवा देना, फिर मैं घर वापस आ जाउँगा.’ 

अब्बा ने घड़ी देखते हुए कहा, - ‘छोटे मियाँ ! आज तो माज़रत, आज कुछ ज़रूरी काम है, फिर कभी हम आपको साथ लिए चलेंगे. या आप यूँ करें कि आपने जो चीज़ें बाज़ार मँगवानी है उनकी लिस्ट बना लीजिए, मैं कल दफ़्तर से वापसी के वक़्त लेता आऊँगा.’

हाँ ! ये ठीक रहेगा. क्यूँ छोटे मियाँ? नानू ने गाजर के हलवे की तश्तरी अपनी तरफ़ खींचते हुए कहा.

छोटे मियाँ ने कुछ भी बोलने से गुरेज़ किया और बस अपनी कंचे जैसी हरी आँखें मटका दीं. 

नानू ने मक्खन लगा फ़्रेंच टोस्ट और ऑमलेट छोटे मियाँ की तरफ़ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘कुलाहे मन स्याह अस्त” का उर्दू तर्जमा क्या होगा?

छोटे मियाँ ने टोस्ट कुरकुराते हुए ऑमलेट का एक टुकड़ा तोड़ कर मुँह में रखा और इत्मिनान से कहा, -‘मेरी टोपी काली है’

शाबाश ! नानू ने ख़ुश होते हुए कहा. ऐसे ही मन लगा कर सबक़ याद करना चाहिए. अच्छे बच्चे कभी अपना सबक़ नहीं भूलते. और सबक़ हमेशा याद रहे इसके लिए बच्चों को चाहिए कि हर सुबह एक ग्लास दूध ज़रूर पिएँ. आप दूध पियेंगे न छोटे मियाँ?

हाँ ! आज छोटे मियाँ ने बिना किसी हुज्जत के ही हथियार डाल दिए थे.

नानू ने दूध का ग्लास छोटे मियाँ की तरफ़ बढ़ाते हुए पूछा, -“बिल्ली को किस भाषा में ‘गातो’ कहते हैं”?

छोटे मियाँ ने दूध का घूँट भरते हुए कहा, - ‘इटालियन में’.

बिलकुल सही जवाब ! और बिल्ली की वैसी ही मूंछें होती है जैसी अभी छोटे मियाँ की बनी हुई हैं. सबकी नज़रें एक साथ छोटे मियाँ की तरफ़ उठीं और कमरा ठहाकों से गूंज उठा. सबको ख़ुद पे हँसते देख छोटे मियाँ शरमाते हुए उठे और हथेली की पीठ से अपने होंठ साफ़ करते कमरे से भाग खड़े हुए.

***
छोटे मियाँ नानू के स्टडी में कबसे गुमसुम बैठे हुए थे. कहाँ तो वो अपने अब्बा हज़ूर को अपने लिए रोज़ दर्जनों चीज़ों के नाम गिनवा देते थे पर जब लिस्ट बनाने की बात आई तो बहुत सोचने के बाद भी कुल जमा आठ नाम. एक क्रिकेट बैट, एक जस्ता काग़ज़ लाइन वाली, एक सफ़ेद, एक स्केल, रंगीन पेंसिल, रंगीन रिबन, रंगीन काग़ज़ और गोंद. पेंसिल का पिछला हिस्सा चबाते हुए छोटे मियाँ यही सोचे जा रहे थे कि क्या हम बच्चों के लिए बाज़ार में ज़्यादा चीज़ें नहीं बिकतीं? अब्बा और अम्मी तो थैले भर-भर के चीज़ें ले आते हैं और मेरे लिए बस आठ ही चीज़ें. क्या बाज़ार की सारी चीज़ें सिर्फ़ बड़ों के लिए ही होती हैं? हमारा भी तो कितना मन करता है ढेर सारे खिलोने ख़रीदें, अच्छी-अच्छी गाड़ियाँ ख़रीदें. मज़े-मज़े की चीज़ें खायें पर हमें तो हर बात पर अम्मी-अब्बा टोक दिया करते हैं कि फलाँ चीज़ सेहत के लिए अच्छी नहीं तो फलाँ चीज़ मेरे लिए, गोया उन्हें मेरी कितनी फ़िक्र है. अगर उन्हें मेरी इतनी ही फ़िक्र है तो मेरे लिए बाज़ार से ढेर सारी चीज़ें क्यूँ नहीं ले आते?


शायद पेंसिल के पिछले हिस्से में कोई विटामिन होती होगी तभी तो हर कोई सोचते वक़्त पेंसिल का पिछला हिस्सा चबाता है और उसले अपने मसले का कोई न कोई हल मिल ही जाता है. पेंसिल चबाते-चबाते छोटे मियाँ को भी आईडिया आ ही गया. वो दौड़े-दौड़े नानू के पास गए और कहा, - ‘नानू क्या आप मुझे एक अठन्नी दे सकते हैं, अम्मी तो पैसे देंगी नहीं.’

नानू ने किताब को उल्टा कर के अपने सीने पे रखते हुए आँखों से चश्मा हटाया और बोले, - ‘हाँ ! मैं आपको एक क्या दस अठन्नी दे सकता हूँ, पर आप अठन्नी का करेंगे क्या?’

‘नानू मैं पास वाले नुक्कड़ पे जाउँगा और वहाँ जो दुकानें हैं न, मैं वहाँ से अपनी पसंद की ढेर सारी चीज़ें ख़रीदूँगा’

‘अच्छा ! नानू ने मुस्कुराते हुए कहा’, और तकिये के नीचे से एक अठन्नी निकाल कर छोटे मियाँ को जल्दी आने की ताकीद करते हुए पकड़ा दिया. पैसे मिलते ही छोटे मियाँ ख़ुश हो उठे और इठलाते हुए  नुक्कड़ की तरफ़ चले जो उनके घर से महज़ 10-20 क़दम की दूरी पर ही था, मगर छोटे मियाँ के क़दम से हिसाब से नुक्कड़ शायद 40-50 क़दम दूर हो.

दूकान पर पहुँचते ही छोटे मियाँ ने कहा, - ‘अंकल ! मुझे एक पतंग दे दीजिये.’

‘लेकिन...बेटा, आप इतने छोटे हो कि आप पतंग नहीं उड़ा पाओगे, आप कोई टॉफ़ी क्यूँ नहीं ले लेते? नहीं मुझे टॉफ़ी नहीं पतंग चाहिए.’

‘पर...आप से पतंग उड़ नहीं पायेगी बेटा, आप पतंग उड़ाने के लिए अभी बहुत छोटे हो.’ ये सुनते ही छोटे मियाँ मायूस हो गए और अठन्नी हथेली में दबाए घर की तरफ़ मुड़ गए. अभी 10-12 क़दम ही चले होंगे की रस्ते में एक बच्चा मिला जो बुरी तरह काँप और सिसक रहा था. छोटे मियाँ ने उस से पूछा कि दोस्त तुम रो क्यूँ रहे हो, और इतना काँप क्यूँ रहे हो?

‘मुझे चार दिन से बहुत तेज़ बुखार है, घर में इतने पैसे नहीं कि मेरी दवा आ सके, इसीलिए मैं यहाँ धूप में बैठा हूँ’ – बच्चे ने कहा.

‘धूप में बैठने से क्या तुम्हारी तबियत ठीक हो जाएगी?’ – छोटे मियाँ ने हैरत से पूछा.

‘नहीं ! तबियत तो ठीक नहीं होगी, पर मुझे कँपकँपी से थोड़ी राहत मिल जायेगी.

‘अच्छा, क्या तुम नुक्कड़ तक मेरे साथ चल सकते हो? मेरे पास एक अठन्नी है, मैं उससे तुम्हारे लिए दवाई ख़रीद दूँगा.’

बीमार बच्चे ने कुछ नहीं कहा, बस चुपचाप छोटे मियाँ के पीछे चलने लगा. नुक्कड़ पर पहुँच कर छोटे मियाँ ने अपनी अठन्नी दुकानदार को देते हुए कहा कि इसे बुखार है, आप इसे दवा दे दीजिये. दुकानदार अठन्नी देखते ही कहा कि इतने पैसे में दवा तो नहीं मिल सकती. कम से कम दो रुपये हों तो मैं तुम्हें दवा दे दूँ.

छोटे मियाँ ने कुछ सोचते हुए कहा, - ‘मेरे पास तो महज़ एक अठन्नी ही है, ये बेचारा बीमार है और काँप रहा है इसलिए धूप में बैठा रो रहा था. कहता है कि धूप से कुछ राहत मिल जाएगी इसे. एक काम कीजिये, आप मुझे चार आने की एक मिठाई और इसे चार आने की धूप दे दीजिये.’

छोटे मियाँ के इस मुतालबे पर बीमार बच्चा और दुकानदार दोनों उनका मुँह देखने लगे जबकि छोटे मियाँ तो अपने लिए मिठाइयाँ पसंद करने में मसरूफ़ थे.
~
नैय्यर / 17-04-2015 
~
ज़हन = दिमाग़, 
तर्जमा = अनुवाद
बोसा = प्यार भरा चुम्बन, 
ताकीद = ज़ोर देना
बेमुरव्वती = लापरवाही, संवेदना विहीन
इंसाफ़ = न्याय, 
माज़रत = क्षमा
दफ़्तर = ऑफिस, कार्यालय, 
तश्तरी = बड़ी प्लेट
गुरेज़ = बचना, 
हुज्जत = बहाना बनना
मायूस = निराश होना
महज़ = सिर्फ़, 
मसरूफ़ = व्यस्त


  

बुधवार, 15 अप्रैल 2015

शर्त (कहानी)

बच्चों, आज मैं तुम्हें अपने बचपन की एक घटना को कहानी के रूप में बताना चाहूँगी. इस घटना से मुझे एक बड़ी सीख मिली थी। बिना किसी के कहे अपनी गलती मान लेने की और उसे फिर न दोहराने की सीख। कहानी शब्दशः वैसी ही नहीं है, जैसी घटना मेरे साथ घटी थी। लेकिन उसका सेंट्रल आइडिया वही है, जो मैंने उस समय महसूस किया था।

बात तब की है जब मैं कक्षा छः में पढ़ती थी। मेरे पिताजी मगरवारा नाम के एक छोटे से स्टेशन पर स्टेशन मास्टर थे और हमलोग वहाँ की रेलवे कॉलोनी में रहते थे। कॉलोनी के अंदर और उसके आस-पास खेलने की बहुत सारी जगह थी- हरे मैदान, कच्ची और पक्की खाली-खाली सड़कें, खेत, बाग, झाडियाँ, ईंट के भट्ठे, फैक्ट्रीज के खाली पड़े फॉर्म। हम बच्चे ट्रेन से स्कूल जाते थे। वापस आकर हम बहुत थक जाते लेकिन फिर भी खूब खेलते और ऊधम मचाते थे।

मैं कॉलोनी के छोटे बच्चों की लीडर थी। सारे बच्चे मेरी बात मानते थे क्योंकि मैं उनको रोज़ कहानी सुनाती थी। शाम को जब तक उजाला होता, हम खेलते और अँधेरा हो जाने पर सब बच्चे मुझे घेरकर कहानी सुनते। बच्चों को मेरी डरावनी कहानियाँ बहुत भाती थीं। लेकिन मैं बच्चों को डराने के लिए कहानी नहीं सुनाती। मैं उनसे कहती कि डरना कोई बुरी बात नहीं, लेकिन हम जिस चीज़ से डर रहे हैं, उसे समझने की कोशिश करनी चाहिए। एक दिन मैं ऐसी ही एक कहानी सुनाते हुए बोली "डरते तो सभी हैं, लेकिन डरकर हार नहीं माननी चाहिए।" तभी मेरा एक दोस्त श्याम बोला "तुम झूठ कहती हो। मैं नहीं डरता।" मैंने कहा "किसी न किसी चीज़ से तो डरते होगे।" पर वो नहीं माना।

बहुत देर तक हममें इस बात पर बहस होती रही। वो अपनी ज़िद पर अड़ा रहा कि वो डरता नहीं। मैं अपनी बात पर कायम कि दुनिया में कोई ऐसा नहीं है जिसे किसी न किसी बात से डर न लगता हो। बच्चे हमारी इस बहस के मज़े ले रहे थे। फिर उनमें से एक बच्चा बोला "गुड्डू दीदी, क्यों न शर्त लग जाए? आप श्याम भईया को डरा दो किसी बात पर।" इस पर श्याम ने मुझे चैलेन्ज किया कि ये मुझे डरा नहीं सकती। मैंने भी ताव में आकर शर्त लगा दी कि मैं तुम्हें डराकर रहूँगी एक न एक दिन।

इस बात को कई हफ्ते हो गए। शायद सब धीरे-धीरे इस शर्त के बारे में भूल गए थे, लेकिन मैं नहीं भूली थी। मुझे लग रहा था कि श्याम ने सबके सामने मुझे चुनौती दी है, और अगर मैंने उसे नहीं हराया तो बच्चों के सामने मेरी साख मिट्टी में मिल जायेगी। मैं बस मौका ढूँढ़ रही थी कि कब श्याम को डरा सकूँ।

रेलवे कॉलोनी के पीछे एक कब्रिस्तान था जिसमें ईसाइयों की कब्रें और हिंदुओं की समाधियाँ थीं। उन समाधियों पर नाम वगैरह भी खुदे थे, जिनसे हमें कुछ खास मतलब नहीं था। चारों ओर पेड़-पौधे और घास का हरा-भरा मैदान था। हमें उधर खेलने को मना किया जाता था। लेकिन हमारे लिए वो "ऊँच-नीच" का खेल खेलने की आदर्श जगह थी। हम घरवालों से बिना बताए सर्दियों के संडे वहाँ ज़रूर पहुँच जाते।

उस दिन भी हमलोग वहाँ पहले 'आइस्पाईस" खेले और उसके बाद ऊँच-नीच खेलने लगे। इस खेल में एक "चोर" होता था, जो दौड़-दौड़कर सबको पकड़ता और बाकी बच्चे किसी ऊँची जगह चढ़कर खुद को बचाते। बीच-बीच में जगह की अदला-बदली होती। जो भी एक जगह ज़्यादा देर तक रहता या फिर जिसको जगह बदलते समय चोर छू लेता वो चोर हो जाता।

मैं चोर थी और सबको पकड़ रही थी। सब इधर-उधर भाग रहे थे। श्याम थोड़ी दूर झाडियों में एक समाधि पर चढ़ गया था। सफ़ेद रंग से पुती हुयी वह समाधि उस जगह सबसे बड़ी और ऊँची थी। समाधि के ऊपर की ओर चार खम्बों पर एक छत भी पड़ी हुयी थी। ऊँचे होने के कारण उस पर चढ़ने-उतरने में थोड़ा समय लगता था।  हम सारे बच्चे कॉलोनी की ओर जाने वाली सड़क की ओर थे और श्याम अंदर उस समाधि की ओर। मुझे यही सबसे आइडियल समय लगा उसे डराने का।

मैंने चिल्लाकर कहा "श्याम, तुम्हारे पीछे कोई है।"
श्याम बोला "हट, झूठ बोल रही हो।"
"सच्ची, उसकी बड़ी-बड़ी मूँछें हैं और हाथ में तलवार। तुम्हें नहीं दिख रहा?" मैंने एकदम परेशान सा चेहरा बनाकर कहा।
अब श्याम थोड़ा डर गया। बाकी बच्चे पहले तो मेरी बात से थोड़ा चौंके। फिर सबने हमेशा की तरह मेरी हाँ में हाँ मिलाना शुरू किया।
"अरे हाँ, गुड्डू सच कह रही है। वो तुम्हारी ही ओर आ रहा है। भाग वहाँ से!"
मैंने भी कहा, "भाग श्याम!"

और सड़क की ओर दौड़ने लगी। सारे बच्चे पहले ही सड़क की ओर दौड़ लगा चुके थे। हमने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। श्याम 'रुको-रुको' चिल्लाकर हमारे पीछे दौड़ा। लेकिन हम सब भागकर पहले ही कॉलोनी में ओर आ चुके थे। बच्चों ने मुझसे पूछा "अब क्या करें?" तो मैंने उन्हें अपने-अपने घर भेज दिया।

दूसरे दिन हम स्कूल से जब वापस आये तो पता चला कि श्याम की तबियत खराब है। श्याम की मम्मी ने मेरी अम्मा से शिकायत की थी। मुझसे पूछताछ हुयी तो मैंने पूरी बात बता दी। मुझे बहुत डाँट पड़ी। एक तो हम बिना बताये उस जगह खेलने गए, दूसरे सबने मिलकर श्याम को डराया। श्याम उस घटना से इतना ज़्यादा डर गया था कि उसे बुखार हो गया था। हम सारे साथी श्याम को देखने गए। श्याम रुआँसा होकर बोला "डरा तो लिया था तुमने। फिर भाग क्यों आये थे तुमलोग मुझे छोड़कर?" मैं बहुत दुखी हुयी उसकी यह बात सुनकर।

मुझे नहीं पता था कि बात इतनी बढ़ जायेगी। पता होता तो शायद ऐसा न करती। हमारी ज़रा सी शैतानी ने श्याम को इतनी तकलीफ दी। मैंने उस दिन मन ही मन निश्चय किया कि कभी ऐसी उल्टी-सीधी शर्त नहीं लगाऊँगी। कभी भी अपने किसी साथी को बीच रास्ते में छोड़कर नहीं भागूँगी। हँसना-बोलना, हँसी-मज़ाक, एक-दूसरे को चिढ़ाना और बुद्धू बनाना- ये सब बातें एक लिमिट में अच्छी लगती हैं। और कुछ भी हो, खेल हो या और कोई समय, अपने किसी साथी को एकदम अकेले नहीं छोड़ना चाहिए।

सोमवार, 6 अप्रैल 2015

बातूनी मैना (कहानी)

बच्चों आज एक कहानी सुनाती हूँ। यह कहानी मैंने बचपन में 'बालहंस' नाम की पत्रिका के लिए लिखी थी जो उसके लघुकथा विशेषांक में छपी भी थी। मुझे अब थोड़ी-थोड़ी याद है लेकिन मैं उसे नए ढंग से यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ.-

एक जंगल में एक मैना रहा करती थी। वह थी तो बहुत सीधी-सादी, किसी को परेशान भी नहीं करती थी, लेकिन बोलती बहुत थी। जब कोई जानवर बात करता तो मैना उसकी बात दोहराने लगती। इसलिए सभी उससे दूर भागते रहते थे। जंगल के जानवर उसे "बातूनी मैना" कहते थे। बेचारी मैना की बहुत ज़्यादा बोलने की आदत के कारण कोई उससे दोस्ती नहीं करता था। लेकिन मैना फिर भी किसी से नाराज़ नहीं होती। वह अकेले ही डाली-डाली फुदक-फुदककर गीत गाती रहती थी।

एक दिन सभी जानवर अपने-अपने खाने की तलाश में इधर-उधर व्यस्त थे। बातूनी मैना डाल पर बैठकर आराम कर रही थी। तभी उसने देखा कि जिस पेड़ पर वह बैठी थी, उसी के नीचे अजीब सी वेशभूषा में कुछ मनुष्य खुसुर-फुसुर बातें कर रहे थे। मैना अपनी आदत के मुताबिक़ उनकी बातें सुनने लगी। वे कह रहे थे- "हम रात को आकर जाल फैलायेंगे। गड्ढा खोदेंगे और उसे घास से ढँक देंगे। कोई न कोई जानवर तो गिरेगा ही उसमें।"

मैना उनकी बात का मतलब तो नहीं समझ पायी लेकिन हमेशा की तरह बात दोहराने लगी "गड्ढा खोदेंगे-गढ्डा खोदेंगे, जाल बिछायेंगे-जाल बिछायेंगे।" जब उन आदमियों ने मैना को बोलते सुना तो उनमें से एक कहने लगा "चलो, अभी कहीं और चलकर बात करें। ये चिड़िया तो टायं-टायं करके बोलने ही नहीं दे रही है।" तभी दूसरा बोला "अब क्या बात करनी है? योजना तो बना ही ली है। अब रात में आयेंगे।" फिर सब बोले "चलो!" और वहाँ से चले गए।

भोली-भाली बातूनी मैना बिना कुछ समझे बड़ी देर तक उनकी बातें दुहराती रही। फिर थककर सो गयी। शाम को जब सभी जानवर अपने-अपने काम से वापस लौटे तो उनकी चहल-पहल से मैना जाग गयी। उसे उन आदमियों की बातें याद आयी तो वो फिर से दोहराने लगी- "गड्ढा खोदेंगे-गढ्डा खोदेंगे।जाल बिछायेंगे-जाल बिछायेंगे। रात में आयेंगे-रात में आयेंगे।"मैना तो हमेशा ही बक-बक करती रहती थी। इसलिए किसी ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। लेकिन 'उछलू' बन्दर ने गौर किया कि आज मैना कुछ अलग सी बातें कर रही है। उसने जब ध्यान दिया तो उसे लगा कि ज़रूर कुछ गड़बड़ है।

उछलू बन्दर ने  सभी जानवरों को बुलाकर कहा-"देखो, ये बातूनी क्या बोल रही है।" सभी जानवर ध्यान से सुनने लगे। मैना आँखें बंद करके सारी बातों को ऐसे दोहरा रही थी, जैसे राग मल्हार गा रही हो--"गड्ढा खोदेंगे-गढ्डा खोदेंगे। जाल बिछायेंगे-जाल बिछायेंगे। रात में आयेंगे-रात में आयेंगे।" 'किट्टू' गिलहरी बोली- "उछलू, ये तो शिकारियों की बातें लगती हैं। गढ्डा खोदकर जाल वही बनाते हैं हाथियों को फँसाने के लिए।" "हाँ-हाँ, फिर ये हाथी को मारकर उसके दाँत तोड़ लेते हैं। हमें हाथियों के सरदार 'मोटामल' को तुरंत खबर करनी चाहिए।" खरगोश 'कुद्दीलाल' ने कूद-कूदकर कहा। "हाँ-हाँ सही कहा" सभी जानवर एक साथ बोल पड़े।

फिर सभी जानवर मिलकर हाथियों के टोले की ओर निकल पड़े। उन्होंने हाथियों के सरदार 'मोटामल' को पूरी बात बतायी और सावधान रहने को कहा। हाथी सतर्क हो गए और घने जंगल में अंदर की ओर जाकर छिप गए। रात में शिकारी आये तो उन्हें एक भी जानवर नहीं मिला। शिकारी समझ गए कि जानवर सतर्क हो गए हैं और अब उनका जाल बिछाना व्यर्थ है। इसलिए वे निराश होकर वापस चले गए।

दूसरे दिन सुबह सभी जानवर इकट्ठे होकर मैना के पास गए। हाथियों के सरदार 'मोटामल' ने मैना से कहा- "प्यारी मैना, हमने तुम्हें कभी दोस्त नहीं बनाया, लेकिन तुमने बुरा नहीं माना और हमारी जान बचाई। अब से हम सब तुम्हारे दोस्त हैं।" मैना ने अपनी आदत के अनुसार मोटामल की बात दुहराई- "हम सब तुम्हारे दोस्त हैं।" सारे जानवर हँस पड़े। साथ में मैना भी हँसने लगी। आज मैना की वजह से जंगल में सुख-शान्ति थी और मैना को खूब सारे दोस्त मिल गए थे।