बुधवार, 9 सितंबर 2015

शिशु गीत: सीमा द्वारा

अंता मंता लेइला
तीन तलोका पाइला
गंगा में बहाइला
गंगा माता बालू दिहिन
ऊँ बलुवा भुजैनिया के दिहनी
भुजैनिया हम्मय दाना देहेश
ऊँ दनवा घसकरवा के देहनी
घसकरवा हम्मय घास देहस
ऊँ घसवा हम गैया के देहनी
गइया हम्मय दूध देहस
ऊँ दूधवा हम राजा के देहनी
राजा हम्मय घोड़ा देहेन्
घोड़ा चढ़े आइला
बछेड़े चढ़े जाईला
पुरानी भीत गीरय वाली बा
नयी भीत उठय वाली बा
पुलुलु पुलुलु

गुरुवार, 27 अगस्त 2015

कुत्ते और सियार (कहानी)

बच्चो, आज आपको एक मज़ेदार लोककथा सुनाऊँगी. लोककथा उसको कहते हैं जो नानी-दादी, मम्मी-पापा आदि हम बच्चों को सुनाते हैं, लेकिन वह कहीं लिखी नहीं होती. ये कहानी मुझे मेरे बाऊ यानि पापा ने सुनायी थी. हो सकता है कि आपने ये किस्सा किसी और रूप में पहले भी सुना हो. कुत्ते और सियार एक ही श्रेणी के जानवर होते हैं. ये लोककथा इस कल्पना पर आधारित है कि सियार और कुत्ते अलग-अलग कैसे रहने लगे- कुत्ते शहर में और सियार जंगल में.

बहुत पहले कुत्ते और सियार एक साथ जंगल में रहा करते थे. साथ-साथ रहने के कारण अक्सर खाने की कमी हो जाया करती थी. वो लोग जब भी इंसानों को देखते उनके मन में जिज्ञासा पैदा होती कि ये कैसे रहते हैं? क्या खाते हैं? उन्हें लगता कि शहर में खूब ढेर सारी खाने की चीज़ें होती हैं और अगर हम बारी-बारी से जाकर उन्हें चुरा लाएं, तो हमारी खाने की समस्या दूर हो सकती है. पर शहर जाने का जोखिम कोई नहीं उठाना चाहता था. उनको आदमियों से डर लगता था.
कुत्ते थोड़े ज़्यादा तगड़े थे. इसलिए एक दिन तय हुआ कि कुत्ता लोग शहर जाकर खाने की चीज़ें लायेंगे. अगर इसके लिए आदमियों को काटना भी पड़े तो कोई बात नहीं. तो अपनी पूरी हिम्मत जुटाकर कुत्ते शहर की ओर निकल पड़े. लेकिन शहर जाकर कुत्तों को आदमियों से प्यार हो गया. इंसानों ने कुत्तों को अपने यहाँ प्यार से रख लिया. जिन्हें घर में जगह नहीं भी मिली, वो भी गलियों में रहकर कुछ न कुछ खाने को पा जाते थे. 
इंसानों से इतना प्यार और खाने की चीज़ें पाकर कुत्तों ने उनके यहाँ चोरी करके वापस जंगल जाने का विचार त्याग दिया. उन्हें लगा कि अब इंसानों के यहाँ चोरी करना, उन्हें धोखा देना हुआ. लेकिन दूसरी ओर उन्हें सियारों से किया अपना वादा भी याद था. कुत्ते बड़े असमजंस में पड़ गए कि आखिर वो करें तो क्या करें? आखिर में कुत्तों ने तय किया कि जब भी सियार अपने काम के लिए पूछेंगे तो कुत्ते उनको डाँटकर चुप करा देंगे. 
तब से जब भी सियार जंगल की ओर से अपने काम के बारे में पूछते हैं "हुआऽऽऽऽ?? हुआऽऽऽऽ??" तब इधर शहर से कुत्ते उन्हें डाँटकर कहते हैं "भक् भक्"...:) 

है न, मज़ेदार किस्सा ?

शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

नानी गयी लन्दन (बालगीत)

(बच्चो, आज प्रस्तुत है ये बालगीत. इसे मैंने पृथ्वी परिहार जी के फेसबुक स्टेटस से उठाया है. उनके अनुसार इसके गीतकार अज्ञात हैं. लेकिन पृथ्वी जी का आभार कि उन्होंने इस गीत को हमसे साझा किया)

दस पत्ते तोड़े
एक पत्ता कच्चा
हिरण का बच्चा
हिरण गया पानी में
पकड़ा उसको नानी ने

नानी गई लंदन
लंदन से लाई कंगन
कंगन गया टूट
नानी गई रूठ
नानी को मनाएंगे
रसमलाई खाएंगे
रसमलाई अच्छी
हमने खाई मच्छी
मच्छी में कांटा
तेरे मारा चांटा
चांटा लगा जोर से
हमने खाए समोसे
समोसे बड़े अच्छे
मामा जी नमस्ते!

बुधवार, 29 जुलाई 2015

दो तितलियाँ (कहानी)


गर्मी की छुट्टियाँ शुरु हो गयी थीं हर साल की तरह इस बार भी मिथली को अपने दादा - दादी के पास गाँव जाना था. उसकी माँ पैकिंग मे लगी थी मिथली ने भी अपनी गुड़िया, खिलौने, टॉफ़ी, चॉकलेट और लूडो पैक करवा लिया था. कल सुबह की ट्रेन से उसे दिल्ली से अपने गाँव जाना था. रात को खाने के बाद माँ ने उसे जल्दी सोने को कहा वह बिस्तर पर लेट तो गयी लेकिन गाँव जाने की खुशी मे उसे नींद नहीं आयी वह बार बार माँ को आवाज़ लगा कर अपना सामान गिनवाती और पूछती कुछ छूटा तो नहीं. बिस्तर पे लेटे लेटे उसे याद आया कि उसे अपनी बेस्ट फ्रेंड तितली के लिये ग्रीटिंग कार्ड बनाना था. वह झट के उठ के आर्ट की कापी का एक पेज, पेंसिल ,रबर, स्केल और कलर ले आयी उसने पेज को कार्ड की तरह फोल्ड किया और उसपे बहुत सारे फूल, तितलियाँ और आसमान मे उड़ती चिड़ियाँ बना डालीं बीचोंबीच मे उसने एक लड़की बनाई और अपने चमकीले रंगों से सब को जीवंत कर दिया . कार्ड के एक कोने पर उसने रंगीन पेंसिल से लिखा To my best freind titli और नीचे दूसरे कोने पे उसने लिखा from your best freind mithli. Engish के Exam की तरह मिथली ने कार्ड पर भी friend की स्पेलिंग गलत ही लिखी थी.

आज सुबह वह माँ की एक आवाज़ मे ही उठ गयी जल्दी जल्दी नाश्ता कर के फूलो वाली पीली फ्राक पहन के गुड़िया वाला बैग कंधों पे लटका के तैयार हो गयी. माँ पापा के साथ वह स्टेशन पहुँची ट्रेन मे सब अपनी सीट पर बैठ गये मिथली हर जाती हूई ट्रेन और लोगों को हाथ हिला कर विदा करती जैसे सब उसके अपने हों. कुछ ही देर मे उसकी गाड़ी भी चल दी सूरज ढलने से पहले वह अपने गाँव पहुँच गयी घर पहुँचते ही दादा ने उसे गोद मे उठा लिया वह चिड़िया की तरह चहकती हूई सफर का सारा किस्सा सबको सुना रही थी कुछ ही पलों मे पूरे घर मे वह अपने पावँ के निशान बना आई थी. वह अपने बैग से कुछ निकाल रही थी कि तभी बाहर से आवाज़ आयी मीथली मीथली ... अपनी बेस्ट फ्रेंड तितली की आवाज़ सुनकर वह बाहर दौड़ी चली आई लेकिन मीथली को देखते ही उसका खिला हुआ गुलाबी चेहरा पीला पड़ गया. तितली व्हील चेयर पर बैठी हाथ मे आम की टोकरी लिये मुस्कुरा रही थी उसने आम की टोकरी मीथली की तरफ बढ़ाते हुए कहा, बाबा से कह के ताज़े मंगवाये हैं. तितली की बात काटते हुए मीथली बोल पड़ी , तितली यह क्या हुआ ? तुम व्हील चीयर पे क्यों ? तितली कुछ बोलती कि दादा जी बोल पड़े , कुछु महिने पहले एक सड़क हादसे मे तितली को चोट लग गयी थी इसलिए वह अब चल नही पाती.

मीथली को यह जानकर बहुत दुख हुआ अब तितली उसके साथ दौड़ नहीं सकती थी खेल नहीं सकती थी शाम को दोनो ने खूब बातें की मीथली ने अपनी दोस्त को ग्रीटिंग कार्ड दिया चाकलेट दी अपने खिलौने और कहानी की किताब दिखाई . रात को तितली मीथली से घर आने का वादा ले के अपने घर चली गई. अब रोज़ दोनों मिलती कहानियाँ पढ़ती ,गुड़िया खेलतीं अपने अपने स्कूल की बातें बतातीं , लेकिन मीथली बाग मे खेलना चाहती थी वह फूल चुनना चाहती थी उसका मन करता था आम तोड़ने का, तितलियाँ पकड़ने का ऊँच नीच खेलने का पूरे गाँव मे दौड़ लगाने का. धीरे धीरे वह दूसरे बच्चों के साथ खेलने लगी, तितली उसे खेलते देखती रहती. धीरे धीरे मीथली अपनी दोस्त तितली से दूर जाने लगी ,वह अब तितली को बिना लिए ही दूसरे बच्चों के साथ खेलने चली जाती लेकिन फिर भी तितली उसके पीछे पीछे उस जगह पहुंच जाती.

एक दिन फूल तोड़ने और रंग बिरंगी चमकीली तितलियाँ पकड़ने के लिए बच्चों के कहने पर वह कल्लन सेठ के बगीचे में दीवार फांद कर कूद गई उसकी दोस्त तितली ने उसे मना भी किया लेकिन उसने नहीं सुना . थोड़ी ही देर मे बगीचे से कुत्तों के भौकने और बच्चों के चीखने चिल्लाने की आवाज़े आने लगीं , सब बच्चे दीवार फांद फांद कर भाग गये लेकिन मीथली सबसे छोटी होने की वजह से बड़ी मुशकिल से कुत्तों से बच के दीवार पर चढ़ पायी , बगीचे के इस पार दीवार ज्यादा ऊँची थी उसके पाँव मे काँटा भी चुभा हुआ था वह इतना ऊँचा अब कूद नहीं सकती थी . अपनी दोस्त तितली को देखकर वह फफक फफक कर रोने लगी , तितली ने अपनी व्हील चेयर दीवार से सटा दी और उस पर पैर रखकर उतरने को कहा . मीथली उस व्हील चेयर की मदद से नीचे उत्तरी तितली ने उसके पाँव का काटा निकाला , मीथली को अपनी गलती का एहसास हो गया था वह समझ गयी थी कि तितली ही उसकी सच्ची दोस्त है और उसने तितली से उसकी बात न मानने के लिये माफी मांगी और हमेशा बेस्ट फ्रेंड बने रहने का वादा किया. कुछ माह के इलाज के बाद तितली ठीक़ हो गयी और फिर से दोनों एक घर से दूसरे घर कूदने लगीं , दादा ने दोनों को दौड़ा कर पकड़ा और बोले मैने तो आज दो तितलियाँ पकड़ लीं ,यह सुनकर दोनों खिल खिला के हँस पड़ी.

~
ज़ैतून ज़िया, लखनऊ
~
06 जुलाई 1989 को हरदोई में जन्मी ज़ैतून ज़िया ने महिला विद्यालय इंटर कॉलेज से 10वीं की परीक्षा पास करने के बाद लाल बाग महिला इंटर कॉलेज लखनऊ से 12वीं की परीक्षा पास किया. उसके बाद कानपूर विश्वविद्यालय से ज़ूलॉजी, बॉटनी और केमिस्ट्री के साथ इन्होने स्नातक किया और इंटीग्रल यूनिवर्सिटी से बी.एड करने के बाद कानपूर विश्वविद्यालय से ही इन्होंने एजुकेशन में स्नाकोत्तर पास किया. सेंट. थेरेसा हाई स्कूल में इन्होंने 6वीं से 10वीं तक जैविक विज्ञान शिक्षका के रूप में कार्य किया और फिलहाल ए जामिया मिलिया इस्लामिया से एम.फिल. कर रही हैं.


शनिवार, 2 मई 2015

पिता-पुत्र

(बच्चो, आज प्रस्तुत है मित्र हिमांशु पाण्डेय द्वारा रचित एक शिक्षाप्रद बाल कहानी। यह कहानी पहले भी 'रचनाकार' ब्लॉग पर प्रकाशित हो चुकी है।)

प्रातःकाल पिता ने अपने सुत को चूम जगाया।
सिर सहला उसको दुलार से अपनी गोद उठाया।
पास सटी फ़ुलवारी में ले उसको लगा घुमाने ।
फ़ूल-फ़ूल पर नाच रही तितलियाँ लगा दिखलाने।


घर में आज बहुत ही पहले प्यारा बेटा जागा ।
देखा छत पर शोर मचाता उड़कर बैठा कागा ।
पूछा, पूज्य पिताजी छत पर आया कौन हमारे?
बोला, यह कौवा है मेरे राजा-बेटा प्यारे ।


कुछ ही क्षण में वही प्रश्न फ़िर बच्चे ने दुहराया।
'बाबूजी यह कौन हमारे छत पर उड़कर आया?"
बड़े प्यार से कहा बाप ने, "यह कौआ है बेटा।
खुली हवा में फ़ुदक रहा है रह न सकेगा लेटा।


बेटे ने फ़िर उत्सुकता से वही प्रश्न दुहराया ।
बड़े प्यार से कहा पिता ने बेटा कौआ आया।
बार-बार पूछता रहा वह "कौन-कौन है आया?"
"कौआ है,कौआ है बेटे," पिता यही बतलाया।


बेटे का उत्तर देने में पिता न थका न हारा ।
उसको तो प्राणों से प्रिय था उसका पुत्र दुलारा।
कुछ ही दिन में बाप हो गया बुड्ढा गयी जवानी।
अब उसकी बुढ़िया देती थी उसको दाना-पानी।


बात एक दिन की है कोई दरवाजे पर आया ।
पूछा "कौन?" पिता ने बेटे ने तब नाम बताया।
कम सुनता था पूछ पड़ा फ़िर,"कौन द्वार पर बेटे?"
वह गुस्से में झल्लाया, "बुड्ढे रह चुपके लेटे ।


तुमको क्या चुपचाप कोठरी में न लेटने आता ।"
सह बूढ़ा एक ही बात को बार-बार दुहराता ।
जब भी कुछ पूछता जोर से डाँट पुत्र चिल्लाता।
"नाकों में दम किया, क्यों नहीं यह बुड्ढा मर जाता।"


देख पुत्र का ढंग बाप को हुई बहुत हैरानी ।
माथ ठोकने लगा उमड़ आया आंखों में पानी।
यह कैसा हो गया जमाना कौन किसे समझाये।
लाज-हया हो गयी विदा अपने हो गये पराये ।


कई बार बेटे को उसने अपने पास बुलाया ।
फ़िर तुरंत टेकते लकुटिया पास पुत्र के आया।
कहा,"सुनो तुम छोटे थे, था छत पर कौआ आया।
तुमने पूछा तो मैंने था कई बार बतलाया ।


मैने गुस्सा किया न मेरी जीभ थकी बतलाते ।
एक बार पूछा तो बेटे, तुम इतना गुस्साते ।
बाहर-भीतर दोनों से ही भला आदमी दीखो ।
प्यारे-पुत्र बड़े बूढ़ों का आदर करना सीखो ।


        
-हिमांशु कुमार पाण्डेय
सकलडीहा, चन्दौली (उ0प्र0) 232109
चिट्ठा : सच्चा शरणम 

रविवार, 26 अप्रैल 2015

चार आने की धूप (कहानी)

(बच्चो, आज आपके लिए एक कहानी पोस्ट कर रही हूँ, जिसे हमारे एक साथी नैय्यर इमाम सिद्दीकी ने लिखा है. इसमें कुछ शब्द आपको कठिन लगेंगे, तो उनके अर्थ कहानी के अंत में दे दिए गए हैं. इससे आप कुछ नए शब्द भी सीखेंगे और कहानी का मज़ा भी लेंगे. आपको ये कहानी निश्चित ही बहुत अच्छी लगेगी.) 


“बिल्ली को किस भाषा में ‘गातो’ कहते हैं”?

नींद से बोझल आँखों को मसलते हुए उसने अँधेरे में उस आवाज़ को टटोलने की कोशिश की जिसने उसे ठिठुरती सर्दी की गर्म रात में ख़ूबसूरत नींद से जगाया था.

बोलो ! “बिल्ली को किस भाषा में ‘गातो’ कहते हैं”?

नानू ! आपको भी आधी रात का ही वक़्त सूझता है सबक़ पूछने के लिए? आवाज़ पहचानते ही उसने गर्म लिहाफ़ के अन्दर से कसमसाते हुए कहा. मैं तो सबक़ सुनाने के लिए देर रात तक आपकी स्टडी में आपका इंतज़ार करता रहा पर आप आए ही नहीं तो मैं सोने चला आया.

मैं आधी रात में सवाल इसलिए पूछता हूँ कि इस वक़्त ज़हन बिलकुल साफ़ और शांत होता है. इस वक़्त ज़हन पर जो कुछ भी उकेरा जाता है वो पत्थर की लकीर की तरह अमिट हो जाता है, समझे !  अच्छा, ये बताओ फ़ारसी का सबक़ याद हुआ या नहीं?

उसने करवट बदलते हुए कहा, हाँ ! याद हो गया है नानू.

तो फिर ये बताओ कि ‘कुलाहे मन स्याह अस्त’ का उर्दू तर्जमा क्या होगा?

नानू ! इस बार उसने लिहाफ़ से ज़रा सा मुँह बाहर निकाल कर कहा, – ‘सब याद है पर अभी सब कुछ गुडमुड सा है. सुबह नाश्ते के वक़्त आपको सब कुछ सुना दूँगा.

अच्छा, तो अब तुम आराम से सो जाओ, सुबह नाश्ते के वक़्त मिलते हैं. नानू ने उसके गाल थपथपाते हुए उसके माथे पर बोसा दिया और लिहाफ़ ठीक से ओढ़ने की ताकीद करते हुए कमरे से बाहर निकल गए.

***
सुबह 8:30 बजे नाश्ते की टेबल पर सभी घरवाले इकट्ठे थे. छोटे मियाँ को हलवे के साथ बेमुरव्वती से इंसाफ़ करते देख अब्बा ने कहा कि, - ‘इतनी जल्दी क्या है, आराम से खाओ. हलवा कहीं भागा तो नहीं जा रहा.’ छोटे मियाँ भला कब चुप रहने वाले थे, तपाक से बोले, - ‘हलवा तो बेशक यहीं होगा, लेकिन आप ऑफ़िस चले जायेंगे. कई रोज़ से आप मेरी चीज़ें लानी भूल जा रहे हैं. आज तो मैं आपके साथ ही चलूँगा. आप दुकान से मुझे मेरी चीज़ें दिलवा देना, फिर मैं घर वापस आ जाउँगा.’ 

अब्बा ने घड़ी देखते हुए कहा, - ‘छोटे मियाँ ! आज तो माज़रत, आज कुछ ज़रूरी काम है, फिर कभी हम आपको साथ लिए चलेंगे. या आप यूँ करें कि आपने जो चीज़ें बाज़ार मँगवानी है उनकी लिस्ट बना लीजिए, मैं कल दफ़्तर से वापसी के वक़्त लेता आऊँगा.’

हाँ ! ये ठीक रहेगा. क्यूँ छोटे मियाँ? नानू ने गाजर के हलवे की तश्तरी अपनी तरफ़ खींचते हुए कहा.

छोटे मियाँ ने कुछ भी बोलने से गुरेज़ किया और बस अपनी कंचे जैसी हरी आँखें मटका दीं. 

नानू ने मक्खन लगा फ़्रेंच टोस्ट और ऑमलेट छोटे मियाँ की तरफ़ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘कुलाहे मन स्याह अस्त” का उर्दू तर्जमा क्या होगा?

छोटे मियाँ ने टोस्ट कुरकुराते हुए ऑमलेट का एक टुकड़ा तोड़ कर मुँह में रखा और इत्मिनान से कहा, -‘मेरी टोपी काली है’

शाबाश ! नानू ने ख़ुश होते हुए कहा. ऐसे ही मन लगा कर सबक़ याद करना चाहिए. अच्छे बच्चे कभी अपना सबक़ नहीं भूलते. और सबक़ हमेशा याद रहे इसके लिए बच्चों को चाहिए कि हर सुबह एक ग्लास दूध ज़रूर पिएँ. आप दूध पियेंगे न छोटे मियाँ?

हाँ ! आज छोटे मियाँ ने बिना किसी हुज्जत के ही हथियार डाल दिए थे.

नानू ने दूध का ग्लास छोटे मियाँ की तरफ़ बढ़ाते हुए पूछा, -“बिल्ली को किस भाषा में ‘गातो’ कहते हैं”?

छोटे मियाँ ने दूध का घूँट भरते हुए कहा, - ‘इटालियन में’.

बिलकुल सही जवाब ! और बिल्ली की वैसी ही मूंछें होती है जैसी अभी छोटे मियाँ की बनी हुई हैं. सबकी नज़रें एक साथ छोटे मियाँ की तरफ़ उठीं और कमरा ठहाकों से गूंज उठा. सबको ख़ुद पे हँसते देख छोटे मियाँ शरमाते हुए उठे और हथेली की पीठ से अपने होंठ साफ़ करते कमरे से भाग खड़े हुए.

***
छोटे मियाँ नानू के स्टडी में कबसे गुमसुम बैठे हुए थे. कहाँ तो वो अपने अब्बा हज़ूर को अपने लिए रोज़ दर्जनों चीज़ों के नाम गिनवा देते थे पर जब लिस्ट बनाने की बात आई तो बहुत सोचने के बाद भी कुल जमा आठ नाम. एक क्रिकेट बैट, एक जस्ता काग़ज़ लाइन वाली, एक सफ़ेद, एक स्केल, रंगीन पेंसिल, रंगीन रिबन, रंगीन काग़ज़ और गोंद. पेंसिल का पिछला हिस्सा चबाते हुए छोटे मियाँ यही सोचे जा रहे थे कि क्या हम बच्चों के लिए बाज़ार में ज़्यादा चीज़ें नहीं बिकतीं? अब्बा और अम्मी तो थैले भर-भर के चीज़ें ले आते हैं और मेरे लिए बस आठ ही चीज़ें. क्या बाज़ार की सारी चीज़ें सिर्फ़ बड़ों के लिए ही होती हैं? हमारा भी तो कितना मन करता है ढेर सारे खिलोने ख़रीदें, अच्छी-अच्छी गाड़ियाँ ख़रीदें. मज़े-मज़े की चीज़ें खायें पर हमें तो हर बात पर अम्मी-अब्बा टोक दिया करते हैं कि फलाँ चीज़ सेहत के लिए अच्छी नहीं तो फलाँ चीज़ मेरे लिए, गोया उन्हें मेरी कितनी फ़िक्र है. अगर उन्हें मेरी इतनी ही फ़िक्र है तो मेरे लिए बाज़ार से ढेर सारी चीज़ें क्यूँ नहीं ले आते?


शायद पेंसिल के पिछले हिस्से में कोई विटामिन होती होगी तभी तो हर कोई सोचते वक़्त पेंसिल का पिछला हिस्सा चबाता है और उसले अपने मसले का कोई न कोई हल मिल ही जाता है. पेंसिल चबाते-चबाते छोटे मियाँ को भी आईडिया आ ही गया. वो दौड़े-दौड़े नानू के पास गए और कहा, - ‘नानू क्या आप मुझे एक अठन्नी दे सकते हैं, अम्मी तो पैसे देंगी नहीं.’

नानू ने किताब को उल्टा कर के अपने सीने पे रखते हुए आँखों से चश्मा हटाया और बोले, - ‘हाँ ! मैं आपको एक क्या दस अठन्नी दे सकता हूँ, पर आप अठन्नी का करेंगे क्या?’

‘नानू मैं पास वाले नुक्कड़ पे जाउँगा और वहाँ जो दुकानें हैं न, मैं वहाँ से अपनी पसंद की ढेर सारी चीज़ें ख़रीदूँगा’

‘अच्छा ! नानू ने मुस्कुराते हुए कहा’, और तकिये के नीचे से एक अठन्नी निकाल कर छोटे मियाँ को जल्दी आने की ताकीद करते हुए पकड़ा दिया. पैसे मिलते ही छोटे मियाँ ख़ुश हो उठे और इठलाते हुए  नुक्कड़ की तरफ़ चले जो उनके घर से महज़ 10-20 क़दम की दूरी पर ही था, मगर छोटे मियाँ के क़दम से हिसाब से नुक्कड़ शायद 40-50 क़दम दूर हो.

दूकान पर पहुँचते ही छोटे मियाँ ने कहा, - ‘अंकल ! मुझे एक पतंग दे दीजिये.’

‘लेकिन...बेटा, आप इतने छोटे हो कि आप पतंग नहीं उड़ा पाओगे, आप कोई टॉफ़ी क्यूँ नहीं ले लेते? नहीं मुझे टॉफ़ी नहीं पतंग चाहिए.’

‘पर...आप से पतंग उड़ नहीं पायेगी बेटा, आप पतंग उड़ाने के लिए अभी बहुत छोटे हो.’ ये सुनते ही छोटे मियाँ मायूस हो गए और अठन्नी हथेली में दबाए घर की तरफ़ मुड़ गए. अभी 10-12 क़दम ही चले होंगे की रस्ते में एक बच्चा मिला जो बुरी तरह काँप और सिसक रहा था. छोटे मियाँ ने उस से पूछा कि दोस्त तुम रो क्यूँ रहे हो, और इतना काँप क्यूँ रहे हो?

‘मुझे चार दिन से बहुत तेज़ बुखार है, घर में इतने पैसे नहीं कि मेरी दवा आ सके, इसीलिए मैं यहाँ धूप में बैठा हूँ’ – बच्चे ने कहा.

‘धूप में बैठने से क्या तुम्हारी तबियत ठीक हो जाएगी?’ – छोटे मियाँ ने हैरत से पूछा.

‘नहीं ! तबियत तो ठीक नहीं होगी, पर मुझे कँपकँपी से थोड़ी राहत मिल जायेगी.

‘अच्छा, क्या तुम नुक्कड़ तक मेरे साथ चल सकते हो? मेरे पास एक अठन्नी है, मैं उससे तुम्हारे लिए दवाई ख़रीद दूँगा.’

बीमार बच्चे ने कुछ नहीं कहा, बस चुपचाप छोटे मियाँ के पीछे चलने लगा. नुक्कड़ पर पहुँच कर छोटे मियाँ ने अपनी अठन्नी दुकानदार को देते हुए कहा कि इसे बुखार है, आप इसे दवा दे दीजिये. दुकानदार अठन्नी देखते ही कहा कि इतने पैसे में दवा तो नहीं मिल सकती. कम से कम दो रुपये हों तो मैं तुम्हें दवा दे दूँ.

छोटे मियाँ ने कुछ सोचते हुए कहा, - ‘मेरे पास तो महज़ एक अठन्नी ही है, ये बेचारा बीमार है और काँप रहा है इसलिए धूप में बैठा रो रहा था. कहता है कि धूप से कुछ राहत मिल जाएगी इसे. एक काम कीजिये, आप मुझे चार आने की एक मिठाई और इसे चार आने की धूप दे दीजिये.’

छोटे मियाँ के इस मुतालबे पर बीमार बच्चा और दुकानदार दोनों उनका मुँह देखने लगे जबकि छोटे मियाँ तो अपने लिए मिठाइयाँ पसंद करने में मसरूफ़ थे.
~
नैय्यर / 17-04-2015 
~
ज़हन = दिमाग़, 
तर्जमा = अनुवाद
बोसा = प्यार भरा चुम्बन, 
ताकीद = ज़ोर देना
बेमुरव्वती = लापरवाही, संवेदना विहीन
इंसाफ़ = न्याय, 
माज़रत = क्षमा
दफ़्तर = ऑफिस, कार्यालय, 
तश्तरी = बड़ी प्लेट
गुरेज़ = बचना, 
हुज्जत = बहाना बनना
मायूस = निराश होना
महज़ = सिर्फ़, 
मसरूफ़ = व्यस्त


  

मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

गट्टू

बच्चों, आज मैं आपको एक और फिल्म के बारे में बताने जा रही हूँ, जो आपको बहुत अच्छी लगेगी. फिल्म का नाम है "गट्टू" और इसे Children Film Society of India ने बनाया है. निर्देशक हैं- राजन खोसा. 20 जुलाई 2012 को रिलीज़ हुयी इस फिल्म को फिल्म समीक्षकों ने बहुत सराहा.

फिल्म का हीरो गट्टू एक बेहद गरीब लड़का है और अपने एक रिश्तेदार के यहाँ काम करता है. उसके पास स्कूल की फीस लायक पैसे नहीं हैं इसलिए स्कूल नहीं जाता. गट्टू को पतंग उड़ाना बहुत पसंद है और वो बहुत सी पतंगों को काट चुका है. लेकिन कस्बे में एक ऐसी पतंग है जिससे पेंच लड़ाकर कोई जीत नहीं पाया. उस पतंग को कस्बे के बच्चे 'काली' कहते हैं. गट्टू का सपना है कि वह एक न एक दिन इस पतंग को ज़रूर काटेगा. वह सोचता है कि अगर कस्बे के स्कूल की छत से पतंग उडाये तो काली को जीत सकता है.

एक दिन मौका पाकर गट्टू एक बच्चे की यूनिफॉर्म पहनकर स्कूल में घुस जाता है. वह स्कूल पहुँच तो जाता है लेकिन उसे पढ़ना-लिखना तो आता ही नहीं. अब आप सोचिये कि गट्टू कैसे सबके सवालों का जवाब दे पायेगा? क्या गट्टू छत तक पहुँचकर काली को काट पायेगा या पकड़ा जाएगा और सज़ा पायेगा? ये सब आपको फिल्म देखकर ही पता चल पायेगा. मैं बता दूँगी तो सस्पेंस खत्म हो जाएगा न ?

तो आप अपने मम्मी-पापा से कहकर ये फिल्म मंगवाएँ और ज़रूर देखें. आपके मम्मी-पापा और बड़े भाई-बहनों को भी फिल्म खूब मज़ेदार लगेगी. यहाँ मैं 'गट्टू' के ऑफिसियल ट्रेलर का वीडियो लगा रही हूँ. यू ट्यूब पर ये मूवी कुछ किस्तों में देखने को मिल सकती है.